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(इंदिरा गांधी: पुण्यतिथि विशेष) नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका मूल्यांकन केवल उनके कार्यकाल से नहीं बल्कि उनके फैसलों, राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरगामी प्रभावों से होता है। श्रीमती इंदिरा गांधी ऐसी ही शख्सियत थीं। रियासतों के विशेषाधिकार और राजाओं के प्रिवी पर्स समाप्त करने से लेकर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, बांग्लादेश के निर्माण और सिक्किम के भारत में विलय तक, उनके राजनीतिक जीवन में ऐसे अनेक फैसले दर्ज हैं, जिन्होंने देश की राजनीति और सामरिक स्थिति को प्रभावित किया। 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या ने भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत कर दिया। इतिहास का कम चर्चित अध्याय श्रीमती गांधी की पुण्यतिथि पर उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा अध्याय याद करना भी जरूरी है, जिसकी चर्चा वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध की तुलना में अपेक्षाकृत कम होती है। यह अध्याय है वर्ष 1967 में नाथू ला और चो ला दर्रों पर भारतीय सेना तथा चीनी सेना के बीच हुआ सैन्य संघर्ष। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत को मिली पराजय भारतीय सैन्य इतिहास की एक बड़ी त्रासदी थी। इस युद्ध के बाद देश की रक्षा तैयारियों, सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक निर्णयों को लेकर गंभीर सवाल उठे थे लेकिन 1967 में सिक्किम सीमा पर हुए संघर्ष ने यह दिखाया कि भारतीय सेना ने 1962 के अनुभवों से सबक लेते हुए अपनी सैन्य क्षमता और तैयारी में महत्वपूर्ण सुधार किया था। नाथू ला में भारतीय सेना का प्रतिरोध 11 सितंबर 1967 को नाथू ला दर्रे पर भारत और चीन की सेनाओं के बीच तनाव ने हिंसक रूप ले लिया। उस समय भारतीय सेना सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का काम कर रही थी। इसी दौरान दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच विवाद हुआ और चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर गोलीबारी शुरू कर दी। भारतीय सेना ने इसका जवाब दिया। इसके बाद कई दिनों तक दोनों ओर से भारी हथियारों, तोपों और मोर्टार का इस्तेमाल हुआ। इस संघर्ष में भारतीय सेना ने अपनी तोपों का प्रभावी इस्तेमाल करते हुए चीनी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। भारतीय सैनिकों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद मोर्चा संभाले रखा। इस कार्रवाई ने चीनी सेना को यह संदेश दिया कि भारत अब अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति का प्रभावी इस्तेमाल करने में सक्षम है। चो ला में भी पीछे हटी चीनी सेना इसके बाद 01 अक्टूबर 1967 को चो ला दर्रे पर भी दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक अलग सैन्य टकराव हुआ। यहां भी भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना के दबाव का मुकाबला किया और उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इन संघर्षों में भारतीय पक्ष के 88 सैनिकों के शहीद होने और चीनी सेना के 300 से अधिक सैनिकों के मारे जाने के आंकड़े विभिन्न भारतीय विवरणों में मिलते हैं। हालांकि, चीनी हताहतों की संख्या भारतीय आकलनों पर आधारित है और इसके स्वतंत्र तथा आधिकारिक सत्यापन की सीमा को ध्यान में रखना चाहिए। वर्ष 1967 के ये संघर्ष इसलिए महत्वपूर्ण थे क्योंकि इन्होंने वर्ष 1962 के बाद भारतीय सेना की बदली हुई सैन्य तैयारी, आत्मविश्वास और प्रतिरोध क्षमता को प्रदर्शित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में देश की राजनीतिक दृढ़ता और सेना के साहस ने सीमा पर भारत की स्थिति को मजबूती प्रदान की। सिक्किम का भारत में विलय: सामरिक और राजनीतिक महत्व श्रीमती गांधी के कार्यकाल का एक और महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1975 में सिक्किम का भारत का पूर्ण राज्य बनना था। हिमालय में स्थित सिक्किम की भौगोलिक स्थिति भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वर्ष 1950 की भारत-सिक्किम संधि के बाद वह भारत का संरक्षित राज्य था। उसकी आंतरिक व्यवस्था में राजशाही कायम थी जबकि रक्षा, विदेश संबंध और संचार की जिम्मेदारी भारत के पास थी। समय के साथ सिक्किम में राजशाही और लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच संघर्ष तेज हुआ। वहां लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और भारत के साथ पूर्ण संवैधानिक एकीकरण की मांग उठने लगी। वर्ष 1973 के समझौते और 1974 में हुए राजनीतिक-संवैधानिक परिवर्तनों ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। जनमत संग्रह से विलय का रास्ता 10 अप्रैल 1975 को सिक्किम विधानसभा ने चोग्याल की राजशाही समाप्त करने और सिक्किम को भारत का अभिन्न संवैधानिक हिस्सा बनाने का प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव को जनता की स्वीकृति के लिए 14 अप्रैल 1975 को विशेष जनमत संग्रह कराया गया। इसमें 59637 मत विलय के पक्ष में और 1496 मत विरोध में पड़े। कुल मतदाता लगभग 97 हजार थे। इसके बाद भारतीय संसद ने संविधान का 36वां संशोधन पारित किया। इसके माध्यम से सिक्किम को भारतीय संघ का 22वां राज्य बनाया गया और संविधान में अनुच्छेद 371-एफ जोड़ा गया, जिसमें सिक्किम के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान किए गए। यह संशोधन 16 मई 1975 को अधिनियमित हुआ और इसमें राज्य के गठन के लिए 26 अप्रैल 1975 को प्रभावी तिथि निर्धारित की गई। इस प्रकार सिक्किम का भारत में पूर्ण राज्य के रूप में शामिल होना इंदिरा गांधी के कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामरिक घटनाक्रम था। इसने भारत की हिमालयी सुरक्षा और पूर्वोत्तर क्षेत्र की सामरिक स्थिति को नया आयाम दिया। 1967 से गलवान तक: बदलते भारत-चीन संबंध वर्ष 1967 के नाथू ला और चो ला संघर्ष के बाद भारत-चीन सीमा पर लंबे समय तक वैसी बड़ी सैन्य भिड़ंत नहीं हुई लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा विवाद समाप्त नहीं हुआ। समय-समय पर सीमा पर तनाव और सैन्य गतिरोध की स्थितियां बनती रहीं। 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें भारत के 20 सैनिक शहीद हुए। इस घटना ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर संकट में डाल दिया। सीमा पर सैन्य तैनाती बढ़ी और कूटनीतिक तथा सैन्य स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई। नाथू ला और गलवान की घटनाएं अलग-अलग ऐतिहासिक, भौगोलिक और सामरिक परिस्थितियों में हुईं। फिर भी दोनों से यह स्पष्ट होता है कि भारत-चीन सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए मजबूत सैन्य तैयारी, सतर्क राजनीतिक नेतृत्व और प्रभावी कूटनीति की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत का मूल्यांकन करते समय उनके कार्यकाल के सभी पक्षों को देखना जरूरी है। उनके कुछ फैसले व्यापक समर्थन के पात्र बने तो कुछ फैसलों, विशेषकर आपातकाल को लेकर गंभीर लोकतांत्रिक आलोचनाएं भी हुईं। लेकिन, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों से जुड़े उनके कार्यकाल के महत्वपूर्ण अध्यायों की ऐतिहासिक भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की पराजय और बांग्लादेश के निर्माण में भारत की निर्णायक भूमिका, वर्ष 1967 में नाथू ला और चो ला में भारतीय सेना का प्रतिरोध तथा वर्ष 1975 में सिक्किम का भारत का 22वां राज्य बनना उनके प्रधानमंत्रित्व काल की महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। पुण्यतिथि पर इतिहास से संवाद 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का अर्थ केवल उनके राजनीतिक फैसलों का गुणगान करना नहीं बल्कि उन ऐतिहासिक परिस्थितियों, चुनौतियों और निर्णयों को समझना भी है, जिनसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक दिशा प्रभावित हुई। इतिहास में किसी नेता का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसने कितने समय तक सत्ता संभाली बल्कि इस बात से भी तय होता है कि उसके फैसलों ने देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को किस तरह प्रभावित किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन के ये अध्याय इसी ऐतिहासिक मूल्यांकन का हिस्सा हैं।



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