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मोतिहारी। महात्मा गांधी ने जिस चंपारण की धरती से शिक्षा और आत्मनिर्भरता के जरिए सामाजिक बदलाव की अलख जगाई थी, उसी चंपारण में उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा सपना एक दशक बाद भी अधूरा है और केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के दस वर्ष से अधिक बीत जाने के बावजूद उसका अपना स्थायी परिसर नहीं बन सका है। शिक्षण संकाय से लेकर कुलपति कार्यालय तक अस्थायी रूप से परिसर से बाहर दूसरे भवनों से संचालित हो रहे हैं। अब स्थायी परिसर के लिए उपलब्ध कराई गई 61 एकड़ जमीन को ही बाढ़ग्रस्त बताए जाने का विवाद खड़ा हो गया है। जमीन के लिए वर्षों की प्रतीक्षा के बाद अब उसकी उपयुक्तता पर उठे सवाल ने विश्वविद्यालय के भविष्य और चंपारण के शैक्षणिक विकास की उम्मीदों को फिर से अधर में ला खड़ा किया है। स्थानीय सांसद एवं पूर्व केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने इस पर आपत्ति जताते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। शिक्षा मंत्री के नाम सांसद की पाती सांसद ने 11 अक्टूबर 2026 को लिखे पत्र में विश्वविद्यालय के लिए आवंटित जमीन को बाढ़ग्रस्त बताए जाने संबंधी दावे को भ्रामक और तथ्यहीन बताया है। उन्होंने कहा है कि विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद लंबे समय तक बिहार सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। लगातार प्रयासों के बाद पिछले दो वर्षों में 61 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई गई और विश्वविद्यालय को उसका कब्जा भी मिल गया। स्थायी परिसर निर्माण के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार कर सरकार को भेजा जा चुका है। इसके बावजूद जमीन को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बताने से निर्माण प्रक्रिया पर अनावश्यक संशय पैदा हो रहा है। सांसद के अनुसार, उन्हें जानकारी मिली है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के सचिव की ओर से बिहार सरकार को पत्र भेजकर आवंटित जमीन को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बताया गया है। संभवतः यह प्राक्कलन समिति की ओर से उठाए गए सवालों से संबंधित है। उन्होंने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अंचल कार्यालय के राजस्व अभिलेख, पिछले कई दशकों के बाढ़ मानचित्र और संबंधित क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इस निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करते। उनके मुताबिक, विश्वविद्यालय के लिए चिह्नित जमीन बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में नहीं आती है। इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए उपयुक्त भूमि विश्वविद्यालय के लिए अनुपयुक्त श्री सिंह ने अपने पक्ष के समर्थन में बनकट-बैरिया और फुरसतपुर के भूभाग की भौगोलिक स्थिति का हवाला दिया और कहा है कि यह क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊंचाई पर स्थित है और राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट होने के कारण आधारभूत संरचना के विकास के लिहाज से भी अनुकूल है। इसी इलाके में इंजीनियरिंग कॉलेज, उद्योग विभाग की परियोजनाएं, सीमा सुरक्षा बल का मुख्यालय और भारतीय खाद्य निगम के गोदाम स्थित हैं। एफसीआई के गोदामों में लाखों टन अनाज का भंडारण होता है। उन्होंने सवाल उठाया है कि यदि यह क्षेत्र बाढ़ के लिहाज से असुरक्षित है तो यहां इतनी महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाओं की स्थापना कैसे हुई। उन्होंने संबंधित जमीन की वास्तविक स्थिति के आकलन के लिए राजस्व अभिलेखों और पुराने बाढ़ मानचित्रों को आधार बनाने का आग्रह किया है। सांसद ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से अनुरोध किया है कि उपलब्ध दस्तावेजों और भौगोलिक तथ्यों के आधार पर जमीन को बाढ़ग्रस्त बताए जाने से उत्पन्न भ्रम का निराकरण कराया जाए तथा स्थायी परिसर निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक निर्देश दिए जाएं। संघर्ष, आकांक्षा और क्षेत्रीय असमानता महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना महज एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना नहीं बल्कि चंपारण के लंबे संघर्ष, आकांक्षा और क्षेत्रीय असमानता को दूर करने की उम्मीद से जुड़ा विषय रहा है। चंपारणवासियों के वर्षों के आंदोलन और प्रयासों के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम, 2014 के तहत मोतिहारी में इसकी स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। तीन फरवरी 2016 से विश्वविद्यालय का विधिवत संचालन शुरू हुआ लेकिन स्थापना के एक दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद विश्वविद्यालय को अपना मुकम्मल स्थायी परिसर नहीं मिल सका है। यह स्थिति उच्च शिक्षा के क्षेत्र में चंपारण की लंबी प्रतीक्षा और आधारभूत संरचना के विकास की धीमी गति को उजागर करती है। शिक्षा, रोजगार, उद्योग और निवेश के सीमित अवसर दरअसल, चंपारण का पिछड़ापन केवल उच्च शिक्षा के सीमित अवसरों तक सिमटा नहीं है। जनसंख्या के लिहाज से बिहार में दूसरे और क्षेत्रफल की दृष्टि से तीसरे स्थान पर रहने वाला पूर्वी चंपारण प्रति व्यक्ति आय के मामले में प्रदेश के 38 जिलों में 34वें स्थान पर है। उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, यहां प्रति व्यक्ति आय 44992 रुपये है जबकि बिहार का औसत 76490 रुपये है। शिक्षा, रोजगार, उद्योग और निवेश के सीमित अवसरों ने जिले की आर्थिक प्रगति को लंबे समय से प्रभावित किया है। प्रथम बुनियादी विद्यालय की बापू ने रखी थी बुनियाद यह वही चंपारण है, जहां महात्मा गांधी ने 13 नवंबर 1917 को ढाका प्रखंड के बड़हरवा लखनसेन में देश के पहले बुनियादी विद्यालय की बुनियाद रखी थी। गांधी के शिक्षा और आत्मनिर्भरता के विचारों से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरती पर आज भी उच्च शिक्षा के एक प्रमुख केंद्रीय संस्थान को अपना स्थायी ठिकाना नहीं मिल पाना कई सवाल खड़े करता है। धूमिल होती उम्मीदें केंद्रीय विश्वविद्यालय का स्थायी परिसर चंपारण के लिए केवल भवनों और कक्षाओं का निर्माण नहीं होगा। यह उच्च शिक्षा, शोध, रोजगार, कौशल विकास, स्थानीय उद्यमिता और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। विश्वविद्यालय के पूर्ण विकसित होने से न केवल पूर्वी और पश्चिमी चंपारण बल्कि उत्तर बिहार और सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के अवसर मिल सकते हैं। शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की बढ़ती गतिविधियों से स्थानीय बाजार, आवास, परिवहन, सेवा क्षेत्र और रोजगार के नए अवसर विकसित होने की संभावनाएं भी जुड़ी हैं। ऐसे में पहले जमीन उपलब्ध कराने में वर्षों की देरी और अब आवंटित जमीन को बाढ़ग्रस्त बताने को लेकर उठे सवाल इस परियोजना के सामने नई चुनौती हैं। सवाल केवल 61 एकड़ जमीन की प्रकृति का नहीं बल्कि उस शैक्षणिक और आर्थिक भविष्य का भी है, जिसकी उम्मीद में चंपारण ने केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए लंबा संघर्ष किया था।