Full Story
मोतिहारी। एक ही जिले में शराब से जुड़े आरोपों में गिरफ्तार दो लोगों की चिकित्सकीय जांच में शराब सेवन से जुड़े ट्रेमर (कंपकंपी) के लक्षण मिलने और परिजनों के पुलिस पर मारपीट एवं रिश्वत मांगने के आरोप लगाए जाने के बीच दोनों को न्यायिक अभिरक्षा में केंद्रीय कारा भेजा गया, जहां पहुंचते ही कारा चिकित्सक ने उन्हें इलाज के लिए सदर अस्पताल रेफर कर दिया और उपचार के दौरान दोनों की मौत हो गई जबकि मेडिकल बोर्ड से कराए गए पोस्टमार्टम में मृत्यु का निर्णायक कारण सामने नहीं आ सका और दोनों का बिसरा सुरक्षित रख लिया गया। इन दो घटनाओं के बीच जुड़ती कड़ियां अब सिर्फ दो बंदियों की मौत की कहानी नहीं रह गयी हैं। वे गिरफ्तारी के बाद बंदी की चिकित्सकीय जांच, पुलिस अभिरक्षा, न्यायिक अभिरक्षा, जेल चिकित्सा व्यवस्था और अस्पताल में उपचार की पूरी श्रृंखला पर सवाल खड़ा करती हैं। सवाल यह नहीं है कि मौत के बाद बिसरा क्यों सुरक्षित रखा गया। सवाल यह है कि मौत से पहले दिखाई दे रहे संकेतों को कितनी गंभीरता से लिया गया था? एक पर्ची पर ‘सीवियर ट्रेमर’, दूसरी तरफ ‘फिजिकली फिट’ बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में कोटवा थाना क्षेत्र के बड़हरवा कला निवासी 52 वर्षीय सुधीश कुमार को 29 सितंबर को उत्पाद अधिनियम के मामले में गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, उसके पास से 10 लीटर शराब बरामद हुई थी। 30 सितंबर को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, कोटवा में उसकी चिकित्सकीय जांच हुई। चिकित्सा पर्ची संख्या 2845 में वजन 50 किलोग्राम, रक्तचाप 140/80 और नाड़ी 78 दर्ज है। उसी पर्ची पर “सीवियर अल्कोहलिक ट्रीमोर” लिखा गया और साथ में “अदर वाइज फिजिकली फिट” भी दर्ज किया गया। यहीं से सवाल जन्म लेता है। एक ओर पर्ची पर गंभीर स्तर की कंपकंपी का उल्लेख है, दूसरी ओर व्यक्ति को शारीरिक रूप से फिट बताया गया। यदि ट्रेमर शराब के सेवन में कमी या अचानक बंद होने से संबंधित लक्षण था तो उसकी चिकित्सकीय गंभीरता का मूल्यांकन क्या किया गया और वह कितना गम्भीर था? क्या किसी उपचार या निगरानी की जरूरत समझी गयी? उपलब्ध दस्तावेज इन सवालों का पूरा उत्तर नहीं देते। पुलिस के अनुसार, चिकित्सकीय परीक्षण के बाद सुधीश को न्यायालय में पेश किया गया और न्यायालय के आदेश पर केंद्रीय कारा भेज दिया गया। लेकिन जेल पहुंचते ही तस्वीर बदल गयी। केंद्रीय कारा के अधीक्षक विजय अरोड़ा के अनुसार कारा चिकित्सक ने उसे अस्वस्थ पाया और उसी रात सदर अस्पताल भेज दिया। अस्पताल में उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गयी। अच्छेलाल की कहानी भी अलग नहीं थी इसी जिले में हरसिद्धि थाना क्षेत्र के घिउवाढार निवासी 35 वर्षीय अच्छेलाल पासवान की कहानी भी इससे अलग नहीं थी। उसे 05 अप्रैल 2026 को शराब के अवैध कारोबार के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अगले दिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उसकी जांच हुई। चिकित्सा पर्ची संख्या ई-1333 में रक्तचाप 120/80 और वजन 51 किलोग्राम दर्ज है। गैस की दवा और ओआरएस की सलाह दी गयी लेकिन उपलब्ध पर्ची में न तो किसी गंभीर बीमारी का उल्लेख है और न स्पष्ट फिटनेस प्रमाणन। अच्छेलाल को न्यायालय में पेश किया गया और न्यायिक अभिरक्षा में केंद्रीय कारा भेज दिया गया। जेल पहुंचते ही उसके हाथ में कम्पन पायी गयी। जेल प्रशासन के अनुसार कारा चिकित्सक ने तत्काल उसे सदर अस्पताल भेज दिया। 06 अप्रैल की रात करीब 9.45 बजे उसे सदर अस्पताल के नशामुक्ति वार्ड में भर्ती किया गया। इलाज चलता रहा लेकिन जीवन नहीं बच सका और 09 अप्रैल की सुबह उसकी सांसें थम गईं। गिरफ्तारी के समय ‘ठीक’, जेल पहुंचते ही अस्पताल क्यों दोनों मामलों की सबसे बेचैन करने वाली समानता यही है। पुलिस अभिरक्षा में प्रारंभिक चिकित्सा जांच हुई। दोनों में स्वास्थ्य से जुड़े संकेत मौजूद थे। दोनों में ट्रेमर की शिकायत सामने आयी लेकिन उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार प्रारंभिक स्तर पर तत्काल उपचार या विशेष चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता नहीं समझी गयी। फिर दोनों को केंद्रीय कारा भेजा गया। और जेल की चौखट पार करते ही कारा चिकित्सकों ने उनकी चिकित्सा स्थिति को गंभीरता से लिया तथा उन्हें सदर अस्पताल भेज दिया। यह विरोधाभास महज चिकित्सकीय रिकॉर्ड का अंतर है या इसके पीछे कोई ऐसी कड़ी है जिसे जांच के दायरे में आना चाहिए? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिरासत में किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य केवल उसका निजी मामला नहीं रह जाता। उसकी सुरक्षा और उपचार की जिम्मेदारी राज्य की संस्थागत जिम्मेदारी बन जाती है। परिजनों के आरोपों में भी एक समानता दोनों मामलों में मृतकों के परिजनों ने पुलिस पर रिश्वत मांगने के आरोप लगाए। सुधीश के परिजनों का दावा है कि उसे छोड़ने के लिए 50 हजार रुपये की मांग की गयी। परिवार ने घर और थाना दोनों जगह मारपीट किये जाने का आरोप भी लगाया है। अच्छेलाल के परिवार ने भी पुलिस पर उसकी मौत के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया। उसकी पत्नी ने कहा था कि गिरफ्तारी के समय वह बीमार नहीं था और आरोप लगाया कि उसकी मौत नहीं हुई बल्कि उसे मार दिया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस ने इन्हें स्वीकार नहीं किया है इसलिए इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, निष्कर्ष का नहीं। लेकिन, दो अलग-अलग घटनाओं में परिवारों की ओर से एक जैसे गंभीर आरोप सामने आना इस सवाल को जरूर जन्म देता है कि हिरासत में बंदियों के साथ व्यवहार और गिरफ्तारी की परिस्थितियों की स्वतंत्र निगरानी कितनी प्रभावी है। अस्पताल पहुंचने के बाद भी नहीं बची जान दोनों मामलों में एक और महत्वपूर्ण समानता सामने आती है। केंद्रीय कारा के चिकित्सकों ने दोनों बंदियों को तत्काल सदर अस्पताल भेजा। यानी जेल स्तर पर उपचार की जरूरत महसूस की गयी। सदर अस्पताल में दोनों का इलाज हुआ, लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार चिकित्सकों ने उन्हें किसी उच्चतर चिकित्सा संस्थान के लिए रेफर करने योग्य स्थिति में नहीं माना। इसके बावजूद दोनों की मृत्यु हो गयी। यहीं चिकित्सा व्यवस्था की अगली कड़ी पर सवाल खड़ा होता है, क्या अस्पताल में भर्ती किये जाने के बाद उनकी हालत की गंभीरता का समुचित आकलन हुआ? क्या आवश्यक जांचें और उपचार समय पर हुए? क्या किसी चरण पर उच्चतर केंद्र भेजने की आवश्यकता थी? यदि नहीं थी तो मृत्यु के बाद उसका कारण क्या निकला? इन सवालों का उत्तर मेडिकल रिकॉर्ड और विशेषज्ञ चिकित्सकीय समीक्षा से ही मिल सकता है। मेडिकल बोर्ड भी मौत का कारण नहीं तलाश सका दोनों मामलों में मौत के बाद मेडिकल बोर्ड का गठन कर पोस्टमार्टम कराया गया। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार पोस्टमार्टम के दौरान भी मृत्यु का निर्णायक कारण स्पष्ट नहीं हो सका। इसके बाद बिसरा सुरक्षित रख लिया गया, ताकि रासायनिक या अन्य फोरेंसिक जांच से मृत्यु के कारण की पड़ताल की जा सके। कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया के लिहाज से बिसरा सुरक्षित रखना जांच का हिस्सा हो सकता है। लेकिन पत्रकारिता का सवाल इसके आगे है, यदि मृत्यु का कारण तत्काल स्पष्ट नहीं हुआ, तो क्या जांच भी वहीं समाप्त हो जाती है? या फिर यहीं से असली जांच शुरू होनी चाहिए? ‘बिसरा सुरक्षित’, जवाबदेही भी सुरक्षित रहेगी? हिरासत में हुई मौत किसी सामान्य मृत्यु की तरह नहीं होती। यहां मृत व्यक्ति अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और उपचार के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं होता। वह राज्य की अभिरक्षा में होता है। इसलिए ऐसे मामलों में मृत्यु का कारण केवल एक चिकित्सकीय तथ्य नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न भी होता है। सुधीश के मामले में एक ही चिकित्सा पर्ची पर ‘सीवियर अल्कोहलिक ट्रीमोर’ और ‘फिजिकली फिट’ कैसे साथ दर्ज हुए? अच्छेलाल की प्रारंभिक जांच में स्पष्ट फिटनेस प्रमाणन क्यों नहीं था? दोनों को जेल पहुंचते ही कारा चिकित्सकों ने अस्पताल क्यों भेजा? क्या अस्पताल पहुंचने के बाद दोनों की हालत का पर्याप्त चिकित्सकीय आकलन हुआ? उन्हें उच्चतर चिकित्सा केंद्र की जरूरत क्यों नहीं समझी गयी? और यदि पोस्टमार्टम से मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हुआ तो आगे की जांच कितनी गहराई से होगी? ये प्रश्न किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पारदर्शिता परखने के लिए हैं जिसके संरक्षण में दोनों ने अंतिम सांस ली। मौत के बाद की प्रक्रिया से ज्यादा महत्वपूर्ण है मौत से पहले के संकेत इन दोनों घटनाओं की सबसे मार्मिक तस्वीर शायद यही है, एक तरफ परिवार अपने व्यक्ति की रिहाई की उम्मीद लगाए हुए था और दूसरी तरफ वह अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था। अच्छेलाल के मामले में तो स्थिति और भी विडंबनापूर्ण थी। जिस दिन उसके लिए अदालत में जमानत की सुनवाई हो रही थी, उसी दिन सदर अस्पताल में उसका शव पड़ा था। घर में बेटे की शादी की तैयारी होनी थी, लेकिन परिवार को अर्थी की तैयारी करनी पड़ी। सुधीश के मामले में भी गिरफ्तारी से मौत तक का अंतराल बहुत छोटा रहा। चिकित्सकीय पर्ची में दर्ज असामान्य लक्षण, जेल पहुंचने के बाद चिकित्सकीय हस्तक्षेप और फिर अस्पताल में मौत। इन कड़ियों को अलग-अलग देखने के बजाय एक पूरी श्रृंखला के रूप में देखना होगा। क्योंकि कई बार मौत अंतिम घटना होती है, लेकिन उसकी कहानी उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। सवाल व्यवस्था से है इन दोनों घटनाओं को जोड़ने पर एक बेहद असहज सवाल सामने आता है, क्या यह केवल दो अलग-अलग मामलों में अपनायी गयी सामान्य प्रशासनिक और चिकित्सकीय प्रक्रिया थी, जिसमें दुर्भाग्य से बंदियों की जान चली गयी? या फिर यह ऐसी व्यवस्था की तस्वीर है, जहां गिरफ्तारी के बाद दिखाई देने वाले शुरुआती स्वास्थ्य संकेतों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया जाता, जेल पहुंचने पर स्थिति बिगड़ती है, अस्पताल में उपचार के बावजूद मौत हो जाती है और अंततः मेडिकल बोर्ड के सामने भी मृत्यु का कारण अनिश्चित रह जाता है? इसका उत्तर अभी किसी निष्कर्ष में नहीं, बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच में छिपा है। क्योंकि न्यायिक अभिरक्षा में मौत का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि मौत के बाद क्या किया गया, पोस्टमार्टम हुआ, बिसरा सुरक्षित हुआ या जांच बैठी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मौत से पहले जो संकेत दिखाई दे रहे थे, उन्हें किसने पढ़ा, किसने अनदेखा किया और किसने उनकी जिम्मेदारी ली? और अगर दोनों मामलों में प्रारंभिक जांच से लेकर अंतिम उपचार तक की पूरी श्रृंखला नियमों के अनुरूप थी, तो फिर उन दो जिंदगियों को बचाया क्यों नहीं जा सका? यह केवल दो मौतों का सवाल नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जिसके नाम पर एक गिरफ्तार व्यक्ति को राज्य की अभिरक्षा में सौंप दिया जाता है।




Comments
0