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नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक ( आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़ी परिसंपत्तियों के बहुत अधिक मूल्यांकन को लेकर आगाह किया और कहा कि एआई कंपनियों में तेजी से बढ़ रहा निवेश अभी वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए मददगार साबित हो रहा है लेकिन भविष्य में इसी क्षेत्र से जुड़े जोखिम पूरे वित्तीय बाजार को प्रभावित कर सकते हैं। श्री मल्होत्रा ने कहा कि जैसे-जैसे एआई निवेश चक्र परिपक्व होगा, निवेश या कंपनियों की कमाई में किसी तरह की मंदी वित्तीय परिसंपत्तियों में तेज गिरावट की शुरुआत कर सकती है। इसका असर खासकर एआई की वैल्यू चेन यानी मूल्य श्रृंखला से जुड़ी परिसंपत्तियों पर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी चेताया कि अगला वित्तीय संकट जरूरी नहीं कि किसी बैंक या वित्तीय क्षेत्र से ही शुरू हो। इसकी शुरुआत किसी भू-राजनीतिक घटना, साइबर हमले या तकनीकी विफलता से भी हो सकती है। एआई में बढ़ रहा निवेश, साथ में बढ़ रहे जोखिम आरबीआई गवर्नर ने शनिवार को पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में ‘अनिश्चितता के युग में केंद्रीय बैंकों की भूमिका’ विषय पर आयोजित सत्र में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि एआई निवेश चक्र वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए बड़ा मददगार रहा है। इस क्षेत्र की मजबूत कमाई से एआई से जुड़े शेयरों के मूल्यांकन को काफी फायदा मिला है लेकिन जैसे-जैसे यह निवेश चक्र परिपक्व होगा, तस्वीर बदल सकती है। एआई क्षेत्र में निवेश या कमाई की रफ्तार धीमी पड़ने पर इससे जुड़ी वित्तीय परिसंपत्तियों में तेजी से गिरावट आ सकती है। एआई कंपनियों की कमाई घटी तो बाजार पर असर श्री मल्होत्रा ने ज्यादा जोखिम उठाने के लिए अधिक कर्ज लेकर किए जा रहे निवेश की ओर भी ध्यान दिलाया और कहा कि आने वाले समय में बड़ी एआई कंपनियों के नकदी प्रवाह में कमी आने के साथ बाजार में शेयरों की कीमतें गिर सकती हैं और वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है यानी एआई क्षेत्र में निवेश और कमाई की मौजूदा रफ्तार में बड़ी कमी का असर केवल तकनीकी कंपनियों तक सीमित रहने के बजाय व्यापक वित्तीय बाजार तक पहुंच सकता है। बढ़ता वैश्विक कर्ज भी चिंता की वजह आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक कर्ज की स्थिति पर भी चिंता जताई और कहा कि वैश्विक कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुपात बढ़ गया है, कर्ज की परिपक्वता अवधि कम हुई है और सरकारी बॉन्ड यानी ऋणपत्र पर मिलने वाला रिटर्न तेजी से बढ़ा है। इससे देशों के लिए अधिक उधार लेने की लागत बढ़ सकती है और उनके वित्तीय विकल्प सीमित हो सकते हैं।कंपनियों के लिए सख्त वित्तीय परिस्थितियां कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव डाल सकती हैं। वहीं सरकारी बॉन्ड में होने वाला नुकसान बैंकों की बैलेंस शीट को कमजोर कर सकता है। यह स्थिति ऐसे समय में और चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जब सरकारें मुश्किल में फंसे बैंकों की मदद करने के दौरान खुद वित्तीय दबाव का सामना कर रही हों। एआई के साथ साइबर खतरा भी बढ़ा श्री मल्होत्रा ने एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ पैदा होने वाले साइबर जोखिमों को भी बड़ी चुनौती बताया और कहा कि एआई के आने से साइबर जोखिम, मॉडल से जुड़े खतरे, तीसरे पक्ष पर निर्भरता और इंसानी निगरानी तथा जवाबदेही में कमी जैसी चुनौतियां सामने आई हैं। एडवांस्ड यानी उन्नत एआई के विकास के साथ सबसे बड़ी चिंताओं में साइबर जोखिम शामिल है। यह खतरा खासकर उस वित्तीय तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है, जो दुनिया भर में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और जिसकी कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं है। दुनिया बदल रही, पुराने आंकड़ों से जोखिम समझना मुश्किल आरबीआई गवर्नर ने तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों का भी जिक्र किया और कहा कि वाशिंगटन सहमति के बाद उभरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ने दशकों तक वैश्वीकरण, आर्थिक एकीकरण और सापेक्ष स्थिरता के लिए व्यापक ढांचा दिया, लेकिन अब यह व्यवस्था काफी दबाव में है। भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक बंटवारा, रणनीतिक बदलाव, व्यापार पर रोक, आपूर्ति में बार-बार रुकावट, तकनीक में बड़े बदलाव और मौसम से जुड़े जोखिम एक-दूसरे पर ऐसे असर डाल रहे हैं, जिनका अनुमान लगाना मुश्किल है। पुराने आंकड़ों और पुराने संबंधों के आधार पर इन जोखिमों का मॉडल तैयार करना भी लगातार कठिन होता जा रहा है। ‘अगला वित्तीय संकट बैंक से शुरू हो, जरूरी नहीं’ श्री मल्होत्रा ने भविष्य में वित्तीय संकट की बदलती प्रकृति को लेकर भी महत्वपूर्ण चेतावनी दी और कहा, “अगला वित्तीय संकट शायद किसी बैंक या वित्त से शुरू न हो। यह किसी भू-राजनीतिक घटना, साइबर हमले या प्रौद्योगिकी संबंधी विफलता से शुरू हो सकता है और कई माध्यमों के जरिए वित्तीय तंत्र पर असर डाल सकता है।” उन्होंने कहा कि जोखिम की प्रकृति तेजी से बाहरी, सीमा पार और आपस में जुड़ी हुई बनती जा रही है। सिर्फ मजबूत बैंकिंग तंत्र से नहीं बनेगी बात भविष्य के इन जोखिमों से निपटने के लिए आरबीआई गवर्नर ने पूरे वित्तीय तंत्र को मजबूत बनाने पर जोर दिया और कहा, “एक मजबूत बैंकिंग तंत्र जरूरी तो है, लेकिन काफी नहीं है। हमें सभी क्षेत्रों और संस्थाओं में मजबूती चाहिए।” उन्होंने वित्तीय स्थिरता और महंगाई की स्थिरता के बीच संबंध का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वित्तीय स्थिरता के बिना मुद्रास्फीति स्थिरता का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। मौद्रिक नीति को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए एक स्थिर वित्तीय तंत्र जरूरी है। इसी तरह आर्थिक विकास की पूरी क्षमता का लाभ तभी हासिल किया जा सकता है, जब वित्तीय तंत्र मजबूत और स्थिर हो। पश्चिम एशिया संकट झेला, लेकिन आगे भी सतर्कता जरूरी श्री मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक वित्तीय तंत्र ने पश्चिम एशिया संघर्ष से पैदा हुए आपूर्ति के झटके को अच्छी तरह झेला है लेकिन वैश्विक आर्थिक माहौल अभी भी मुश्किल बना हुआ है। इस टकराव ने महंगाई का दबाव बढ़ाने के साथ वित्तीय तंत्र की कमजोरियों को भी बढ़ाया है। कमोडिटी यानी जिंसों की ऊंची कीमतों और बाहरी क्षेत्र के दबाव के कारण भारत पर भी पश्चिम एशिया संकट का असर पड़ा है। हालांकि मजबूत आर्थिक आधार और मजबूत वित्तीय तंत्र के दम पर भारत इन दबावों को झेलने में सफल रहा। लेकिन, आरबीआई गवर्नर ने इसके साथ भविष्य को लेकर सतर्क भी किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि आज की मजबूती का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में भी हम इन जोखिमों से बचे रहेंगे। एआई निवेश से लेकर बढ़ते वैश्विक कर्ज, साइबर हमलों, भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी विफलताओं तक आरबीआई गवर्नर का जोर इस बात पर रहा कि भविष्य के वित्तीय जोखिम पहले की तुलना में ज्यादा आपस में जुड़े और सीमा पार होते जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले खतरों से निपटने के लिए केवल बैंकों को मजबूत रखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे वित्तीय तंत्र को झटके सहने में सक्षम बनाना जरूरी होगा।



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