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सीवान। लोकआस्था के महापर्व छठ की तैयारियों और उत्साह के बीच मां की कमी से उपजने वाले दर्द को सीवान के भोजपुरी गायक सुशांत अस्थाना ने अपने हाल ही में जारी गीत ‘माई के बिनु छठ...’ में बेहद भावुक अंदाज में प्रस्तुत किया है, जिसमें पूजा की पारंपरिक तैयारियों के साथ मां की ममता, उनसे जुड़ी यादों और उनके बिना त्योहार मनाने की पीड़ा को उभारा गया है। छठ की खुशियों में मां की कमी का दर्द छठ महापर्व का नाम आते ही घर-आंगन की साफ-सफाई, ठेकुआ बनाने की तैयारियां, पूजा के सामान से सजे दउरे और घाटों की रौनक आंखों के सामने आ जाती है लेकिन इन्हीं खुशियों के बीच जब मां का साथ नहीं होता, तो त्योहार की चमक भी अधूरी लगने लगती है। भोजपुरी गायक सुशांत अस्थाना ने इसी भाव को अपने गीत ‘माई के बिनु छठ...’ का आधार बनाया है। गीत में छठ की आस्था के साथ उस खालीपन को महसूस कराया गया है, जो मां को खो चुके लोगों के जीवन में खास अवसरों पर और गहरा हो जाता है। ठेकुआ और दउरा की यादों में बसती है मां इस गीत की खासियत यह है कि मां की याद को किसी बड़ी घटना या जटिल कहानी के जरिए नहीं, बल्कि छठ की रोजमर्रा की तैयारियों से जोड़ा गया है। ठेकुआ बनाना, दउरा तैयार करना और पूजा की सामग्री जुटाना जैसे परिचित दृश्य गीत में भावनाओं का आधार बनते हैं। इन कामों में मां की मौजूदगी, उनका स्नेह और परिवार के लिए उनका समर्पण याद आता है। गीत यह एहसास कराता है कि छठ की तैयारियां केवल पूजा की रस्में नहीं होतीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए अनगिनत पलों की यादें भी उनसे जुड़ी रहती हैं। मां नहीं तो त्योहार में भी अधूरापन ‘माई के बिनु छठ...’ का सबसे मार्मिक पहलू मां को याद करते हुए व्यक्त की गई उदासी है। गीत में ऐसी भावनाएं सामने आती हैं, मानो कोई बेटी अपनी मां से मन की बात कह रही हो। पर्व की तैयारियां पहले की तरह चल रही हैं, पूजा की परंपराएं भी निभाई जा रही हैं, लेकिन मां की अनुपस्थिति हर पल महसूस हो रही है। मां के हाथों से तैयार होने वाली पूजा सामग्री और उनके साथ बिताए छठ के पुराने दिनों की स्मृतियां गीत को और भावुक बनाती हैं। भक्ति गीतों से अलग है ‘माई के बिनु छठ...’ छठ महापर्व पर बनने वाले अधिकांश भोजपुरी गीतों में सूर्यदेव की आराधना, छठी मइया के प्रति श्रद्धा और त्योहार का उल्लास प्रमुखता से दिखाई देता है लेकिन सुशांत अस्थाना का यह गीत पर्व के एक अलग भावनात्मक पक्ष को सामने लाता है इसमें छठ की धार्मिक आस्था के साथ मां के बिना त्योहार मनाने की पीड़ा को केंद्र में रखा गया है। यही वजह है कि गीत केवल पूजा-पाठ की बात नहीं करता, बल्कि परिवार और रिश्तों से जुड़ी उन भावनाओं को भी छूता है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। भोजपुरी लोकभाषा ने बढ़ाया गीत का असर गीत में इस्तेमाल किए गए ठेकुआ, दउरा और छठ की तैयारियों से जुड़े शब्द भोजपुरी समाज के लोकजीवन की पहचान हैं। इन परिचित प्रसंगों के कारण गीत की भावनाएं सहज तरीके से सामने आती हैं। मां की कमी का एहसास कराने के लिए इसमें किसी जटिल भाषा का सहारा नहीं लिया गया है। घरेलू जीवन के सामान्य दृश्यों के जरिए ही रिश्तों की गहराई को उभारा गया है। सुशांत अस्थाना की प्रस्तुति में मां की स्मृति और छठ की परंपराओं का यह मेल गीत को एक संवेदनशील स्वर देता है। छठ सिर्फ पूजा नहीं, पीढ़ियों से जुड़ा रिश्ता भी छठ महापर्व की परंपराएं परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। पूजा की तैयारियों में घर की महिलाओं, विशेषकर मां की भूमिका कई परिवारों में महत्वपूर्ण होती है। उनके साथ सीखी गई परंपराएं अगली पीढ़ियों तक पहुंचती हैं। ऐसे में मां के बिना छठ मनाने का अनुभव केवल किसी प्रियजन की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनसे जुड़ी यादों और संस्कारों को भी ताजा कर देता है। गीत इसी भाव को सामने लाता है कि त्योहारों की असली खुशी पूजा की तैयारियों के साथ उन अपनों की मौजूदगी में भी होती है, जिनके साथ बचपन से ये परंपराएं निभाई जाती रही हैं।